चूकते जाते हम इस जीवन को
कभी भय में कभी लज्जा में कभी आलस्य में
आओ करे अभयता का वरण , उड़े आकाश में , जीए हास्य में ।।
कभी भय में कभी लज्जा में कभी आलस्य में
आओ करे अभयता का वरण , उड़े आकाश में , जीए हास्य में ।।
मैं अपने देश की कला और संस्कृति को लेकर बहुत दुखी हुपिछले १५ से २० सालो में हमारी संस्कृति का जो पतन हुआ हैं वो उल्लेखनीय है इसके मुख्य कारण हैं टीवी चैनल्स और भारत्या सिनेमा है जो मुख्यता विदेशी मूल क भारतीयों को ध्यान में रखकर अपने कार्यकर्म बना रहा है गलती भारतीय निर्देशकों भी नही है विडियो ने आम भारतीय को सिनेमा से दूर कर दिया मै ब्लॉग के माध्यम से पाठको की राय जानना चाहता हूँ